Friday, March 19, 2010
उठो, जागो और कुछ करो
मां की गोद किसे अच्छी नहीं लगती। गंगा भी तो हमारी मां है। हमारी संस्कृति, हमारी चेतना और हमारे संबल की वाहक। मगर आज वह हमें चेतना नहीं देती। उसकी दुखती काया हमें झकझौरती नहीं है। आखिर इस चेतनावान धारा के हम पुत्र कितने चेतनाशून्य हैं। अगर नहीं तो फिर उसकी दशा पर कोई हलचल क्यों नहीं होती है। राजनीति का वह गंदा खेल उसके साथ भी क्यों खेला जा रहा है। नेता से लेकर साधू समाज तक आखिर उसकी हालत पर दुखी होने का स्वांग क्यों रच रहे हैं। अगर यह स्वांग नहीं है तो जाह्नवी की दशा सुधारने को कोई सार्थक प्रयास क्यों नहीं किये जा रहे हैं। राजनीति से लेकर समाज और नदियों से लेकर गलियों तक गंदगी ही क्या हमारी आराधना है।
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विजय जी, आपने देश की सबसे बड़ी समस्या को उठाया है। काफी सराहनीय है। आज के युवा आपके साथ हाथ मिला लें, तो वाकई में हिमालय से लेकर गंगा सागर तक फैली हिंदू संस्कृति में सुधार आ जाये। आपको हमारा बहुत-बहुत धन्यवाद और बधाई।
ReplyDeleteनित्य मिश्रा, डीडी न्यूज
Mr. vijay pratap singh aapka lekh rastriya nadi ganga ke prati kaphi sarahniya hai. yadi aapki soch har bhartiya nagrik ki ho jay to sayed maili hoti ja rhi patit pawni bhagirathi maa ganga ke swaroop ko ujla kiya ja sakta hai.
ReplyDeleteregards,
nitya mishra ( dd news )