गंगा घाटों से गुजरते वक्त हम मुंह तो फेर ही लेते हैं। यह कहते हुए कि गंगा कितनी गंदी है, हम आगे बढ़ जाते हैं। यह दर्शाता है कि हम गंगा को लेकर शायद हमारी संवेदना और आत्मीयता मर गई है। अगर यह सच नहीं है तो फिर हमारे हाथ इस महानदी की सफाई के लिए क्यों नहीं उठ रहे हैं? आखिर गंगा अपनी पीर किससे कहे।
अब सवाल उठता है उन धर्मनिष्ठों से कि उन्हें गंगा को लेकर सुध क्यों नहीं आती है। क्या उनकी भक्ति चंदन और माला तक ही सीमित रह गयी या मंदिर में कब्जों को लेकर ही वह झगड़ते रहेंगे। सवाल उठना चाहिए कि पतित पावनी की सफाई को लेकर उनके क्या कर्तव्य हैं। क्या हर-हर गंगे करते हुए उन्हें गंगा की मलिन बदन की याद नहीं आती है। क्या गंगा की इस हालत पर उनके देवाधिदेव शंकर खुश होंगे? अगर नहीं तो हाथ आगे क्यों नहीं आ रहे।
सवाल प्रशासन की लापरवाही का नहीं है, प्रशासन ऐसे मुद्दों पर कितना संवेदनशील है, यह किसी से छिपा नहीं है। सवाल यह है कि लाल फीताशाही को यह संवेदना सिखायेगा कौन?
अब हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम संस्कृति और गर्व से जुड़ी जाह्नवी की पीड़ा को समझें और सफाई के अभियान को हाथ में लें।
गंगा की सफाई के लिए अब कोई भागीरथ अवतरित होने वाला नहीं है। हममे से ही किसी को भागीरथ बनना होगा। वे भागीरथ कौन होंगे हमें उसका इंतजार रहेगा।
Sunday, March 21, 2010
Friday, March 19, 2010
उठो, जागो और कुछ करो
मां की गोद किसे अच्छी नहीं लगती। गंगा भी तो हमारी मां है। हमारी संस्कृति, हमारी चेतना और हमारे संबल की वाहक। मगर आज वह हमें चेतना नहीं देती। उसकी दुखती काया हमें झकझौरती नहीं है। आखिर इस चेतनावान धारा के हम पुत्र कितने चेतनाशून्य हैं। अगर नहीं तो फिर उसकी दशा पर कोई हलचल क्यों नहीं होती है। राजनीति का वह गंदा खेल उसके साथ भी क्यों खेला जा रहा है। नेता से लेकर साधू समाज तक आखिर उसकी हालत पर दुखी होने का स्वांग क्यों रच रहे हैं। अगर यह स्वांग नहीं है तो जाह्नवी की दशा सुधारने को कोई सार्थक प्रयास क्यों नहीं किये जा रहे हैं। राजनीति से लेकर समाज और नदियों से लेकर गलियों तक गंदगी ही क्या हमारी आराधना है।
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